ग्रहयुति और दिमागी विचार

मन का कारक चन्द्रमा है,यह सवा दो दिन में एक राशि पर भ्रमण करता है,राशि में उपस्थित नक्षत्र और पायों के हिसाब से चन्द्रमा अपनी मानसिक गति देता है। चन्द्रमा भी अपने अनुसार भावानुसार अपन अपना फ़ल देता चला जाता है,जो फ़ल मिलता है वह केवल सोचने से मिलता है,सोचने के बाद सूर्य उस कार्य को करने के लिये द्रिष्टि देता है,जब जाकर शनि सोचे गये गये कार्य को करने के लिये अपना बल देना चालू कर देता है। कभी कभी सोचा गया पूरा नही होता है और मन में अशान्ति भी हो जाती है,वह कार्य चाहे भला हो या बुरा,लेकिन मानसिक गति के अनुसार कार्य की प्रगति ही सन्तोष देने के लिये मानी जा सकती है।

कर्क लगन की कुंडली और इसका स्वामी चन्द्रमा मकर राशि में है,चन्द्रमा सप्तम मे है,आजीवन व्यक्ति को मानसिक कारणों से जूझने के लिये अपनी गति को प्रदान करने वाला चन्द्रमा दसवें वक्री शनि से भी दसवीं नजर से अपना फ़ल चन्द्रमा के अन्दर प्रेषित कर रहा है। मार्गी शनि शरीर की मेहनत करने के लिये बल देता है जबकि वक्री शनि दिमागी मेहनत करने के लिये बल देता है। इस कारण से जातक को जो भी सोचने की कला मिलती है वह दिमागी रूप से बहुत ही अधिक मिलती है लेकिन शनि और चन्द्र कभी भी एक बात के लिये स्थिरता नही दे पाते है,चन्द्रमा की द्रव स्थिति शनि की ठंडी सिफ़्त से अपने को ठंडा करने के बाद बर्फ़ की तरह से जमाने का कार्य करती है और जो भी कार्य शुरु किया गया होता है या सोचा गया है वह जल्दी से बदल भी जाता है,इसलिये अक्सर इस युति का व्यक्ति कभी स्थिरता अपने जीवन में नही ला पाता है। Unstable mind position होने के कारण व्यक्ति जो भी सोचता है वह भी थोडी सी देर में लुप्त हो जाता है। अगर कोई समझदार व्यक्ति इस प्रकार के व्यक्ति के पूंछे गये सवाल का जबाब देना चाहे तो पूंछने वाला ही अपने सवाल को याद नही रख पाता है,और जब जबाब देने वाला अपने जबाब को तैयार करने के बाद जबाब को देना शुरु करता है तो सवाल पूंछने वाला और किसी दूसरे सवाल में उलझा हुआ मिलता है। इसके अलावा भी एक गति देखने को मिलती है कि चन्द्रमा केवल सोचने का कारक है और देखने के लिये सूर्य की स्थिति भी देखी जाती है तथा सोचने की क्रिया को हकीकत में बदलने के लिये शनि की जरूरत पडती है,अगर बुध से सामग्री मंगल से तकनीक शुक्र से सजावट गुरु से जानकारी मिलती है तो वह सोचा गया कार्य पूरा हो जाता है,अन्यथा किसी भी प्रकार के कारक ग्रह की सहायता नही होने से और राहु की कनफ़्यूजन वाली स्थिति तथा केतु की सहायताओं में कमी भी कार्य को पूरा नही करने के लिये जानी जा सकती है।

कर्क लगन की कुंडली में चन्द्रमा उसका मालिक है और मालिक ही अगर सप्तम में है तो सप्तम भाव मंत्रणा का भी जाना जाता है,यानी इस भाव को मंत्री का भाव भी कहा जाता है,इस भाव के आगे जो द्रिष्टि देने वाला भाव होता है वह आठवा भाव कहा जाता है,जो भी मंत्रणा ली गयी होती है वह अगर आठवें भाव की द्रिष्टि और स्वभाव तथा उसके स्वामी की गति से खरी उतरती है तो इस भाव का रिस्क Risk लिया जा सकता है,और कार्य को पूरा करने के लिये पैर मिल जाते है,जो किया जा रहा है उसके लिये ग्यारहवें भाव 11th House को भी देखना जरूरी है वह किये जाने वाले कार्य के प्रति अपनी भौतिक योग्यता को भी प्रदर्शित Show करता है.अगर किसी तरह से राहु आठवें भाव में बैठा है तो वह अपनी प्राप्त मंत्रणा के बारे में भी भ्रम वाली स्थति को पैदा कर देगा और जो भी मंत्रणा मिली है वह या तो भ्रम के कारण समाप्त हो जायेगी या वह आगे कार्य को रूप देने के लिये जब तैयार होगा तो उसके अन्दर तमाम तरह की बाधायें पैदा होने लग जायेंगी। अगर राहु जो भ्रम देने का कारक है और वह ग्यारहवे भाव के मालिक जो कि कर्क लगन से मालिक शुक्र है से देखना पडेगा,शुक्र अगर किसी प्रकार से चौथे भाव में है तो वह कनफ़्यूजन को देने वाले राहु के अष्टम में आजाता है और जातक की सोच जो या तो मकान प्राप्त करने के लिये अथवा शादी के लिये या फ़िर किसी सजावटी कार्य के लिये होगी वह कनफ़्यूजन में ही होगी। अक्सर यह राहु अपनी गति के अनुसार भी फ़ल देता है लेकिन जो भी फ़ल देगा वह मृत तुल्य परिणाम ही देगा। जैसे वर्तमान में यह राहु कर्क लगन के छठे भाव में गोचर कर रहा है तो यह जो भी फ़ल देगा वह कर्जा दुश्मनी बीमारी के प्रति कनफ़्यूजन के अलावा और कोई बात नही देगा,एक बात और भी मानी जा सकती है कि वह गूढ बातों को जानने के लिये अपनी बुद्धि का केवल प्रयोग करेगा,करने के नाम से यह राहु केवल कनफ़्यूजन ही देगा.

अगर किसी तरह से इस राहु पर गुरु भी नजर दे रहा है जैसे कर्क लगन के चौथे भाव में गुरु है तो वह गोचर के छठे राहु पर अपना असर देगा,उसके लिये जातक के अन्दर जो भी इच्छायें कनफ़्यूजन आदि पैदा होंगे वे केवल घर बनाने अपना व्यवसाय करने पानी के साधन बनाने और व्यवसाय की द्रिष्टि से व्यवसायिक सम्पत्ति को बनाने के प्रति ही होंगे। इसके अलावा एक बात और भी समझी जाती है,गोचर से छठा राहु जन्म के अष्टम राहु को भी देख रहा है तो कनफ़्यूजन जो कर्जा दुश्मनी और गूढ ज्ञान को प्राप्त करने के लिये माने जाते है उनकी ली जाने वाली रिस्क के लिये भी व्यक्ति के अन्दर सोच पैदा होगी,और वह अपने तरीके से गूढ जानकारी के बाद उस कार्य को नही करके केवल अपने अन्दरूनी ज्ञान को बढाने और पराशक्तियों आदि के प्रति जानकारी बढाने के लिये भी अपने कनफ़्यूजन को प्रस्तुत करेगा। जो भी कारक कर्जा दुश्मनी बीमारी से जुडे होंगे वे भी गुप्त रूप से जातक को छल करके या झूठ बोलकर अपना कार्य हासिल करने के लिये भी अपना बल देंगे,अक्सर कहा जाता है कि छ: और आठ के अन्दर बैठे ग्रह जातक के प्रति गुप्त रूप से घात करने के लिये माने जाते है और गुप्त रूप से जो घात की जाती है वह इस प्रकार की होती है कि राहु के स्वभाव से अक्समात मिलने वाली मानी जाती है,जैसे कर्जा होना है तो किसी मृत्यु वाले कारण में अक्समात ही होना है,कोई अक्समात ही ऐसी बीमारी भी होनी है जो अक्समात ही खर्चा करवाने के लिये काफ़ी है किसी के साथ लेन देन या काम धन्धे के अन्दर कोई बुरायी आनी है और वह अक्समात ही कर्जा करवाकर चली जानी है,कोई भी दुश्मन अपनी घात को करेगा तो अक्समात ही करेगा,अक्सर जातक को उस समय इसी प्रकार के लोगों से प्रेम भी होने लगता है,और उसे पता है कि अमुक व्यक्ति अपने बाप का नही हुआ है तो उसका क्या होगा लेकिन वह एक प्रकार के नशे के अन्दर उसके साथ चलता चला जाता है जब उसके साथ घात हो जाती है तो वह अपने को ही धिक्कारता है कि अगर उसने पहले से ही सोच लिया होता तो उसके साथ घात नही होती।

कर्क लगन का धन का कारक सूर्य है और अगर सूर्य धन के ही भाव मे है तो जातक के द्वारा सरकार या पिता से मिली नगद धन की सहायता मानी जाती है इसके अलावा तकनीकी जानकारी का मालिक पंचम और दसवें भाव का मालिक है और वह अगर सूर्य के साथ होता है तो जातक अपने पिता की पूंजी को या सरकार से मिली पूंजी को जल्दी से धन कमाने के प्रति अपनी कुशलता को तकनीकी बुद्धि के द्वारा देता है। तीसरे भाव और बारहवे भाव का मालिक बुध है और बुध अगर वक्री होकर इसी धन के भाव मे है तो व्यक्ति अपनी बुद्धि को उल्टा घुमाकर सरकारी या पिता के धन से अधिक धन पैदा करने की कोशिश करने का साहस करेगा। लेकिन इसी धन पर जन्म के राहु की नजर होने के कारण जो अष्टम स्थान में है अचानक धन का सफ़ाया भी करने के लिये बुद्धि को माना जा सकता है। कार्य भाव में विराजमान शनि वक्री है,सूर्य मंगल वक्री बुध से अगर वह युति लेता है तो पिता के लिये माना जा सकता है कि उसने अपनी उल्टी बुद्धि से धन को कमाया है,वह उल्टी बुद्धि धन से धन को कमाने के लिये भी मानी जा सकती है सरकारी सलाहकार के रूप में भी मानी जा सकती है और शिक्षा या संस्कृति वाले कार्यक्रम खेल आदि के द्वारा भी देखी जा सकती है। सूर्य बुध मिलकर जमीन से भी सम्बन्धित होता है और वक्री बुध के होने से जो भी जमीन पिता के द्वारा प्राप्त की जातीहै वह किसी न किसी प्रकार के दखल से या तो वापस चली जाती है या किसी फ़रेबी दोस्त की बातो से उसको खोना माना जा सकता है। इस युति में एक बात और भी देखने को मिलती है कि व्यक्ति के पास केतु का बल होता है,राहु जब अष्टम में है तो केतु जरूर धन भाव में होता है,और सूर्य केतु वक्री बुध तीनो मिलकर जो भी बुद्धि वाला कार्य करते है वह उल्टी बुद्धि वाला ही किया जाता है। केतु या राहु जिस ग्रह के साथ होते है उसकी शक्ति को अपने अन्दर धारण कर लेते है,कर्क राशि के दूसरे भाव में केतु के होने से और सूर्य वक्री बुध के साथ होने से भी व्यक्ति के पिता की और व्यक्ति की खुद की स्थिति किसी न किसी प्रकार की उल्टी राजनीति से भी होती है,वह व्यक्ति अपनी राजनीति से या किसी सरकारी संस्थान में कार्य करने से जो भी उल्टा धन आने की क्रिया होती है सभी को वह प्रयोग करना जानता है,इसके अलावा अगर चौथे भाव में गुरु और शुक्र स्थापित है तो वह लाभ और जीवन यापन के लिये व्यवसायिक स्थान बनाने के लिये ही अपनी बुद्धि को प्रयोग में लाता है। लेकिन यह होगा तभी जब सभी कारक अपने अपने अनुसार अपने अपने समय में सहायता के लिये कारकत्व प्रदान करें.

1 comment:

Rajeev Verma said...

how could i got my new home and money