सुकर्म का कारक गुरु


कर्म की महिमा अपने अपने बडी ही विचित्र है। इस संसार में कर्म अपने अपने अनुसार बनाये गये है। जो भी व्यक्ति मनुष्य रूप में पैदा हुआ है वह अच्छे कर्म करने के लिये ही शुरु हुया है। हर व्यक्ति अपने अपने अनुसार अच्छा ही कर्म करता है लेकिन कभी कभी जाने अन्जाने में वह कर्म भी हो जाते है जो हर मनुष्य को बुरे लगते है। मनसा वाचा कर्मणा जिन कर्मों से हिंसा होती है वे कर्म नही कुकर्म कहलाते है। कुकर्मों का फ़ल यह गुरु अपने अनुसार समय समय पर देता है। लोग अपने कुकर्मों को करने के बाद सोचते है कि उन्हे कोई देख नही रहा है और वे बडे आराम से अपने कुकर्मो को कर रहे है। जब गुरु उनके विपरीत भावों में प्रवेश करता है तो जो कुकर्म किये गये है उनकी सजा भरपूर देने के लिये अपनी कसर बाकी नही छोडता है। जब गुरु अपने अनुसार सजा देता है तो वह यह नही देखता है कि जातक के अन्दर कुकर्मों को करने के बाद धार्मिकता भी आगयी है या वह अपने को लोगों की सहायता के लिये तैयार रखने लगा है बल्कि उसे वह सजा मिलती है जो मनुष्य अपने अनुसार कभी दे ही नही सकता है।

गुरु केतु के साथ मिलकर जब छठे भाव में प्रवेश करता है तो वह धन वाले रोग पहले देना शुरु कर देता है,वह धन को जो किसी प्रकार के कुकर्मो से जमा किया गया है उसे बीमारियों में खर्च करवा देता है जातक को अस्पताल पहुंचा देता है,और उन पीडाओं को देता है जिसे दूर करने में दुनिया के बडे से बडे डाक्टर असमर्थ रहते है। जातक को ह्रदय की बीमारी देता है और गुरु जो सांस लेने का कारक है गुरु जो जिन्दा रखता है,गुरु जो ह्रदय में निवास करता है और हर पल की खबर ब्रह्माण्ड तक पहुंचाता है,यानी जातक के द्वारा जितनी सांसें खींची जाती है और जितनी सांसे ह्रदय के अन्दर थामी जाती है सभी में व्यक्ति के मानसिक रूप से सोचने के बाद कहने के बाद और करने के बाद सबकी खबर हर सांस के साथ ब्रह्माण्ड में पहुंचाता है और हर आने वाली सांस में ब्रह्माण्ड से अच्छे के लिये अच्छा फ़ल और बुरे के लिये बुरा फ़ल गुरु के द्वारा भेज दिया जाता है। अगर व्यक्ति किसी के लिये बुरा सोचता है तो सांस के साथ गुरु उन तत्वों को भेजता जो जातक के सिर के पीछे के भाग्य में जाकर जमा होने लगते है और जातक को चिन्ता नामक बीमारी लग जाती है जातक दिन रात सोचने के लिये मजबूर हो जाता है उसे चैन नही आता है वह खाना समय पर नही खा सकता है वह नींद समय पर ले नही सकता है वह अन्दर ही अन्दर जलने लगता है,और एक दिन वह गुरु उसे लेजाकर किसी अस्पताल या किसी दुर्गम स्थान पर छोड देता है जिन लोगों के लिये जिन कारणों के लिये उसने अपने अनुसार कुकर्म किये थे,उनकी सजा गुरु देने लगता है। व्यक्ति कोजिन्दा रहना भी अच्छा नही लगता है और अन्त में अपने कुकर्मों की सजा यहीं इसी दुनिया में भुगत कर चला जाता है।

लोगों के द्वारा मनीषियॊं के द्वारा कहा जाता है कि स्वर्ग नरक अलग है,लेकिन सिद्धान्तों के अनुसार यहीं स्वर्ग है और यहीं नरक है। जब व्यक्ति सात्विक तरीके से रहता है अपने खान पान और व्यवहार में शुद्धता रखता है और जीवों पर दया करता है तो वह देवता के रूप में स्वर्ग की भांति रहता है। जब व्यक्ति के कुकर्म सामने आने लगते है तो वह अपने स्वभाव में परिवर्तन लाता है,आमिष भोजन को लेने लगता है शराब आदि का सेवन करने लगता है जीवों को मारने और सताने लगता है,अच्छे लोगों के लिये प्रहसन करता है,अपने अन्दर अहम को पालकर सभी को सताने के उपक्रम करने लगता है यही नर्क की पहिचान होती है उसका सम्बन्ध बुरे लोगों से हो जाता है और वह बुरी स्त्री या पुरुषों से सम्पर्क करने के बाद बुरी ही सन्तान को पैदा करता है,अन्त में किसी न किसी भयंकर रोग से पीडित होता है या किसी कारण से अपने को गल्ती करने से अंग भंग कर लेता है अपंग हो जाता है या किसी दुर्घटना उसका शरीर छिन्न भिन्न हो जाता है,उसके पीछे कोई नाम लेने वाला पानी देने वाला नही रहता है,यह नर्क की सजा को भुगतना बोला जाता है।

हर मनुष्य की मर्यादा होती है वह अपने को दूसरे के भले के लिये ही जिन्दा रखे,उसे किसी प्रकार का मोह पैदा नही हो वह जिससे भी मोह कर लेगा वही उसका दुख का कारण बन जायेगा। जिस वस्तु की अधिकता होती है वही वस्तु परेशान करने वाली हो जाती है,यानी अति किसी भी प्रकार से अच्छी नही होती है,इस अति से बचा जाय उतना ही संचय किया जितने से परिवार कुटुंब का पेट भरे और उनके लिये संस्कारों वाली शिक्षायें मिले जो लोग आधीन है वे किसी प्रकार से बुरे रास्ते पर नही जा पायें,वे दुखी नही रहे बुर्जुर्गों को बुजुर्गों वाले सम्मान देने चाहिये और छोटो के लिये हमेशा दया रखनी चाहिये। दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान,तुलसी दया न छोडिये जब लग घट में प्राण।

2 comments:

Himanshu Gupta said...

इतने लंबे लेख लिखने में समय लगाने से कहीं अछ्छा है कि आप दूसरों कि जन्म कुंडली मुफ्त में देख दिया करें !! इससे ज्यादा लाभ होगा

Nitin said...

Himanshu aapko jindagi me kitna kuch mupftme mila hai / lekin aapko uski kadar nahi hogi / to mupftme kundali dekhakar bhi kuch pfayda nahi hoga / koi agar itna yogdan dye raha hai / to uski sarahana karni chahiye /