शाकिनी दोष

शाकिनी दोष के लिये हमेशा कुंडली में अष्टम भाव या वृश्चिक राशि के ग्रहों को देखा जाता है अगर इस भाव या इस राशि में कोइ गृह है और उस गृह को राहू की नजर लगी हुयी है तो शाकिनी दोष पिशाच दोष प्रेत बाधा या ऊपरी हवा का दोष कहा जाता है.एक जातक जिसकी कुंडली में वृश्चिक राशि है और चन्द्रमा के साथ शनि विराजमान है,राहू पंचम में अपने स्थान को बनाकर बैठा है मीन राशिका राहू है और केतु ग्यारहवे भाव में है.अलावा ग्रहों में मंगल धनु राशि का दूसरे भाव में है,गुरु वक्री होकर चौथे भाव में है,सूर्य और बुध दसवे भाव में है,शुक्र तुला राशि का होकर बारहवे भाव में है.वर्त्तमान में केतु की दशा चल रही है और केतु में राहू का अंतर चल रहा है,राहू का गोचर शनि और चन्द्रमा के साथ चल रहा है.

शाकिनी दोष के लिए  यह भी माना जाता है की जातक की पिछली जिन्दगी में कोइ ऐसा काम हो गया था जिसके द्वारा वह इस जीवन में अपने शरीर के दोष के कारण तरक्की नहीं कर पाता है जब तक माता पिता की सहायता रहती है जातक चलता रहता है और जैसे ही माता पिता की सहायता समाप्त होती है जातक का कूच करने का समय आजाता है. इस दोष को देने के लिए जीवन के प्रति पारिवारिक सदस्य अक्सर जिम्मेदार होते है,वह सदस्य भले ही परिवार में अच्छी मान्यता रखते होते है लेकिन उनकी सोच जातक के प्रति गलत ही हो जाती है,इस कारण से कुद्रष्टि का मामला भी माना जाता है.जातक को इस दोष के कारण भोजन पानी शरीर को पनपाने के उपाय सभी व्यर्थ हो जाते है.जो भी दवाईया दी जाती है या जो भी चैक अप आदि करवाए जाते है सभी किसी न किसी प्रकार से दोष पूर्ण हो जाते है और जो भी बीमारी या कारण है वह किसी भी प्रकार से समाझ में नहीं आता है.अक्सर राहू मीन राशि का होकर जब कर्क और वृश्चिक राशि पर अपना असर डालता है और इन भावो में विराजमान ग्रह वह भले ही शनि सूर्य मंगल आदि क्यों न हो वह अपनी दृष्टि से इन्हें बरबाद कर देता है और इनके गलत प्रभाव जीवन में मिलाने लगते है.मीन राशि का राहू आसमानी हवा यानी ऊपरी हवा का कारण माना जाता है,शनि वृश्चिक राशि में शमशानी जमीन के लिए और चन्द्रमा जब शनि के साथ हो तो शमशानी रूप में समझी जाने वाली आत्मा के रूप में माना जाता है.इस आत्मा के प्रभाव से जातक का शरीर कोप होने के समय ठंडा हो जाता है और कभी कभी ऐसा लगता है जातक का कूच करने का समय आ गया है या कोइ भी कार्य करने के लिए जातक अपनी रूचि को पैदा करता है वैसे ही यह राहू शनि चन्द्र का प्रभाव जातक को अचानक सर्दी वाली बीमारी या नाक का बहना अथवा मॉल त्याग के समय अधिक ताकत लगाने के कारण गुर्दों की खराबी जैसी बीमारिया पैदा कर देता है,किया गया भोजन पेट में जमा रह जाता है और उस जमे भोजन की बजह से शरीर में कई तरह के इन्फेक्सन पैदा होने लगते है,यह इन्फेक्सन खून के साथ मिलकर शरीर के तंत्रिका तंत्र पर अपना प्रभाव देते है.इन प्रभावों के कारण शरीर में कभी कभी बहुत अधिक गर्मी मिलती है कभी कभी शरीर बिलकुल ठंडा हो जाता है.अक्सर शरीर के जननांगो में कोइ चमड़ी वाला रोग या खाज खुजली वाली बीमारी भी होनी पायी जाती है.

सूर्य का चन्द्रमा से दसवे भाव में होना और शनि के साथ रहने से जातक के पिता के लिए माना जाता है की उसका निवास किसी शमशानी स्थान में है जहां या तो पहले कोइ कब्र आदि बनी होती है या मुर्दे जलाने का स्थान होता है.इसके अलावा भी देखा जाता है की पिता के द्वारा रहने वाले स्थान के आसपास किसी ऐसे अस्पताल का होना या जहां कसाई वृत्ति से जुड़े कार्यों का होना,जैसे चमड़े का कारोबार होना या पशुओं को काटने के बाद उनका मांस आदि बेचा जाना भी माना जाता है.अधिकतर मामले में पिता का मानसिक क्षेत्र या तो इसी प्रकार के कार्यों से लाभ लेने का होता हो या जातक के पिता के द्वारा बाहरी लोगो को इसी प्रकार के सामानों का बेचना या कारोबार करना हो,जिससे अधिक से अधिक धन का कमाया जाना भी माना जाता है,

1 comment:

Kuldeep Sharma said...

गुरु जी
मेरी मिथुन लगन की कुंडली हे
लगन में सूर्य चन्द्र बुध
मंगल कर्क राशी का 2 भाव में हे
राहू मीन राशी का 10 भाव में हे
वक्री शनि वृश्चिका राशी का 6 भाव मे हे
गुरु मेष राशी का 11 वे भाव में हे
शुक्र वृष राशी का 12 भाव में हे