विनाश का रास्ता !

मौत का भय सभी को अखरता है और कोई हमेशा के लिये रहता भी नही है,अपने अपने काम को करने के बाद सभी इस दुनिया से कूच कर जाते है। कोई किसी को खिलाने के लिये आता है कोई खाने के लिये आता है कोई किसी को जिन्दा करने के लिये और कोई किसी को मारने के लिये,कोई किसी को दुख देने के लिये और कोई किसी को सुख देने के लिये इस दुनिया में आते है अपना काम किया और चलते बने। लेकिन जो रास्ता प्रकृति देती है उसक कारण तो एक ही माना जाता है सभी का पालन करना,फ़ल से अगर पेट भरता है तो फ़ल को ही खाना चाहिये उसके बीज को नष्ट करने से क्या हासिल होना है,जिस पेड ने बडी मेहनत से अपने एक स्थान पर खडे होकर सर्दी गर्मी बरसात आन्धी तूफ़ान के थपेडे सहने के बाद फ़ल को पैदा किया पाला सहेजा पकाया और स्वाद के अनुसार उसमे रस भरे,उस फ़ल के बीज को समाप्त करने का अधिकार तो हमारे पास नही है। लेकिन हम अपने को बुद्धिमान समझ कर भी अन्धे बने है और निराट अज्ञानी की श्रेणी मे गिने जाते है,उसका एक ही कारण है कि फ़ल को खाया सो खाया और बीज को भी बरबाद कर दिया।
यह मनुष्य शरीर भी एक फ़ल के पेड की तरह से ही है,लेकिन फ़ल के पेड को एक स्थान पर खडे होकर अपनी सेवा करनी पडती है मनुष्य शरीर को चल फ़िर कर सेवा करने का मौका दिया गया है। फ़ल का पेड खडे होकर अपने फ़ल के अन्दर भोजन के लिये तत्व प्रदान करता है तो मनुष्य शरीर चल फ़िर कर अपनी बुद्धि का प्रयोग करने के बाद अन्य प्रकार की सहायता करने के तैयार किया जाता है। ईश्वर ने अच्छा बल दिया,अच्छी बुद्धि दी और जाकर पुलिस मे भर्ती हो गये। भर्ती करवाने के लिये ईश्वर ने ही बल और बुद्धि दी थी तभी जाकर भर्ती हो गये,अगर शुरु से ही प्रकृति अन्धा बहरा लंगडा लूला पैदा कर देती तो देखें कैसे भर्ती हो जाते,पुलिस में अन्धो की बहरो की लंगडो लूलों की कोई जगह नही होती है। अगर होती भी है तो पानी पिलाने की सफ़ाई करने की ही होती है दूसरो की रक्षा करने की नही होती है। रक्षा का भार दिया गया और अपनी रक्षा करने की शक्ति की आड मे अगर कोई उल्टा काम करने लगो,जो बलवान है उनकी सहायता की और जो कमजोर है उन्हे और भी बलवानो की खुराक बना दिय तो वह रक्षा वाला काम उसी प्रकार से हो गया जैसे फ़ल को खाया और बीज को भी समाप्त कर दिया। जब फ़ल के बीज को बरबाद कर दिया तो आगे जो संतान होगी वह तुम्हारे वंश के बीज को बरबाद करने वाली होगी,हर चीज तादात से अधिक बुरी होती है। अधिक भूख लगने पर पत्ते खाये जाते है,जब भूख कम होती है तो अनाज को खाया जाता है,और कम भूख होती है तो अनाज को पकाकर खाया जाता है,और जब बहुत ही कम भूख होती है तो अनाज को अलग अलग तरीके से पकाकर खाया जाता है,तो अधिक भूख लगने पर ही भोजन को किया जाये तो फ़ल और बीज खाने की जरूरत भी नही होगी और बेकार में बीज भी बरबाद नही होंगे।
प्रकृति अपने अपने क्षेत्र का कार्य जल थल और नभ मे करवाती है। एक पक्षी अगर घर के ऊपर से उड कर निकल जाता है तो घर के अन्दर की नकारात्मक इनर्जी की कमी हो जाती है। वह आसमानी रूप से आने वाले विक्षेप को रोकने मे सहायक होती है,जैसे कोई खराब ग्रह की रश्मि घर पर आ रही है और उस समय एक पक्षी घर के ऊपर से उड कर निकल जाता है तो उस रश्मि के आने मे बाधा पैदा हो जाती है,और उसी प्रकार से अगर पक्षी अधिक से अधिक घर के ऊपर से निलते जाये तो कितनी बाधा समाप्त हो सकती है। जैसे नर और मादा अपना प्रभाव देते है,उसी प्रकार से सुबह के समय पक्षी सकारात्मक ऊर्जा को घर मे देकर जाता है,देखा होगा एक पक्षी सुबह के समय हमेशा घर के ऊपर से पूर्व से पच्छिम की तरफ़ उड कर जाता है और शाम को वह पश्चिम से पूर्व की तरफ़ के लिये उड कर आता है,यह क्रम हमने नही बनाया और न ही आपने बनाया है यह क्रम प्रकति ने आपके लिये और हमारे लिये बनाया है,हमने पक्षियों को अपना भोजन बना लिया और जब घर मे गलत शक्तियों का निवास हो गया तो अब हम रो रहे है।
आपको डाक्टर बनाया और आपके अन्दर ही प्रकृति ने विद्या का क्षेत्र भरा बाकी के अन्दर नही भरा है उसने तुम्हे इस लायक समझा है कि तुम अपनी विद्या से लोगो की पीडा को समाप्त करने के लिये अपने शरीर और अपनी बुद्धि के साथ अपनी विद्या का प्रयोग करोगे,लेकिन तुम भी अपनी विद्या का दुरुपयोग करने लगे,जब कोई बात किसी को ठीक करने की आयी तो तुमने अपने कारोबार को मानव के शरीर की फ़ैक्टरी से शुरु कर दिया,उसे साधारण दवाई से ठीक किया जा सकता था उसके लिये तुमने अपनी अधिक आय की आवक के लिये तमाम तरह के टेस्ट लिख दिये,उसे एक रुपये की गोली से ठीक किया जा सकता था उसे तुमने सौ रुपये की दवाई इसलिये लिख दी कि दवाई बिक्रेता से तुम्हे अधिक आय होगी,जब अधिक आय ही करनी थी तो डाक्टर का पेशा क्यों अपनाया?  हमने अपने खानपान के अन्दर जानवरी मांस को मिला लिया है हमारे दांत आंत भेजा कुछ भी नही इस तरह के भोजन को हजम कर सकते है,लेकिन एक तामसी मजबूरी जो हर इन्सान के साथ पैदा होती है,एक जीवन को अधिक चलाने के लिये और एक अधिक होने से समाप्त करने के लिये हमे कोई मारने भी नही आये तो भी मरना तो है ही,कोई नही रोक पायेगा,मरना तो है, यह अटल सत्य है। अधिक जोड कर मरोगे तो भी औलाद बरबाद कर देगी,जैसे किसी का फ़ालतू पैसा घर मे आजाता है तो फ़ालतू के खर्चे पैदा हो जाते है उसी प्रकार से फ़ालतू की कमाई देखकर औलाद भी मेहनत नही करने वाली है,पहले तो बरबाद करने के लिये कई रास्ते खोजने पडते थे लेकिन आज की तारीख मे तो इतने रास्ते अपने आप ही सामने आ जाते है कि संसार की दौलत भी मिल जाये तो वह भी एक मिनट मे बरबाद हो जायेगी।
आपको इस बात का भी गम है कि आपके पास अपना आलीशान मकान नही है,आलीशान मकान का मालिक होना तुम्हारे वश की बात नही है,यह तो अकबर की किस्मत मे था कई किले बनाये,सोने चांदी और हीरे जवाहारात को जडने के बाद सिंहासन बनाये,लेकिन आज सभी पर जब बन्दर और कबूतर अपनी अपनी शैली मे खेल खेलते है तो बडी ग्लानि होती है कि पता नही कितने लोगों को इन कामो के लिये मरना पडा होगा कितने घर उजड गये होंगे,कितने लोग अपने जीवन को इन कामो को करने के लिये बरबाद करके गये होंगे कितने जानवरों को अपनी जान पत्थर और सामान ढोने पर देनी पडी होगी लेकिन सबका कोई मूल्य नही है,कोई एक पत्थर का भी प्रयोग नही कर सकता है,अगर देखने भी जाओ तो टिकट और देनी पडती है,तो क्या फ़ायदा हुआ इस प्रकार के खेल खेलने से,यह खेल केवल अहम का था,अहम ही विनाश का रास्ता देता है,अहम ही यह कहता है कि हम ही रहेंगे और किसी को नही रहने देंगे,लेकिन जब हम ही चले जाते है तो दूसरे को कैसे रहने से रोक सकते है,इस अहम को समाप्त करो और अपने को आदमी बनाने मे ही फ़ायदा है,प्रकृति के विरुद्ध आदमी को जानवर और जानवर को आदमी नही बनने तो ठीक है।

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