कालसर्प योग कितना झूठ कितना सच ?

वृश्चिक राशि का तीसरे भाव मे राहु हो तो वह कबाड से जुगाड निकालकर अपने आप की बात को सच करने की कोशिश करेगा,उसका टारगेट भी इतना प्रबल होगा कि वह अपने विचार को विश्व के प्रति भी कहने से नही चूकेगा। कन्या राशि और कन्या लगन तथा कारकांश से निल लोगों की कन्या राशि निकलती है या घडी लगन नवांश की लगन चन्द्रमा आदि जो भी कन्या राशि के जातक है वे वर्तमान मे राहु की सहायता से कहीं से भी कबाड से जुगाड निकालने मे समर्थ है। कारण पिछली मई से कन्या राशि के तीसरे भाव मे राहु का आगमन हुआ है। इस राहु के कारण अक्सर उनकी द्रिष्टि जगत मान्य मान्यताओ से भी पीछे हट कर जा सकती है इस बात का आभास जब हुआ जब एक सज्जन ने और कुछ नही अपनी कालसर्प की मान्यता के पीछे ही अपनी कहानी रच डाली और इस योग को लोगों के द्वारा पागल बनाकर या अपनी कथनी को कहने के लिये पता नही कहां से बहुत पुरानी एक जन्म कुंडली की फ़ोटो जो वास्तव मे लाल किताब पद्धति से बनाई गयी थी लाकर लोगों के सामने रख दिया कि इस पत्री मे जो लिखा है वह पढने योग्य तो है नही कैसे भी अपनी राम कहानी को बनाकर कालसर्प योग को ही झूठा बताकर अपने अहम को जिन्दा रखने का काम किया जाये।
जो लोग शिवजी से अपनी आध्यात्मिक शक्ति से जुडे है उन्हे यह पता है कि उनके शिवलिंग के साथ या उनकी छवि के साथ सर्प को दर्शाया गया है। शिव लिंग को तो सर्प के फ़न से ढका बताया गया है और जललहरी से उस सर्प के प्रवेश को दिखाकर बाकी का पूंछ वाला हिस्सा जललहरी के पास दर्शाया गया है। शिव जो संहार के कारक है और शिवलिंग की जललहरी को सम्भालने का कार्य माता पार्वती के रूप मे दिखाया गया है। यह दोनो ही रूप में शिव और शक्ति को दर्शाया गया है। राहु जो सांप के फ़न से और पूंछ केतु के रूप मे मानी जाती है। केतु रक्षा करने वाला होता है और राहु समाप्त करने वाला होता है। दोनो ही छाया ग्रह है,भगवान शिव के अलावा भी भगवान विष्णु की तस्वीर को देखा जाये तो क्षीर सागर में शेषनाग के ऊपर भगवान विष्णु की शैया है और राहु के रूप मे शेषनाग के फ़न की छाया उनके ऊपर है। राहु को आकाश और केतु को पाताल का कारक भी कहा गया है,आदि काल से राहु के लिये आसमानी सहायता और केतु से जमीनी सहायता का रूप मान्यता मे है जब आसमानी बारिस नही होती है तो जमीनी पानी से जीने के लिये पौधो और फ़सलो की रक्षा करना भी पाया जाता है। देवताओं और असुरों की सहायता से सागर के मंथन की कथा भी सभी ने सुनी होगी उस मंथन से निकलने वाला हलाहल भी था और अमृत भी था। हलाहल को भगवान शिव ने पान किया था अमृत को पान करने के लिये देवताओं को छद्म वेष मे भगवान विष्णु ने अपने अनुभव को आधार बनाया था,लेकिन उस जगत व्यापी अन्तर्यामी भगवान विष्णु ने सूर्य और चन्द्र के अन्दर यह भावना पैदा कर दी थी कि एक असुर भी अमृत पान को कर गया है। सुदर्शन चक्र से उस असुर के दो हिस्से कर दिये गये,सिर का हिस्सा राहु नाम से और धड वाला हिस्सा केतु के नाम से जाना गया। ईश्वर की प्रत्येक लीला मे राहु केतु का खात्मा करने की कथा का वृतान्त है। वह राम रावण युद्ध में रावण जिसके बीस सिर और दस भुजा का वर्णन दिया है। भगवान श्रीकृष्ण की कथा मे कालियादह में कालिया नाग के फ़न को नाथ कर अपने पौरुष का वर्णन और अपने को श्यामल रंग में रंगने की कथा है। चण्ड मुण्ड विनाश मे भी काली जो केतु के रूप मे मानी जाती है का वृतान्त दुर्गासप्तशती जो मार्कण्डेय पुराण यानी देवी भागवत में भी कही गयी है। आदि बातो से पता चलता है कि व्यक्ति का आजीवन इन्ही ग्रहों की चाल से जुडा होना माना जाता है।
जो लोग पौराणिक बातो को या चलने वाली मर्यादा को खतम करने की कोशिश तीसरे राहु से करते है उनके लिये यह भी माना जाता है कि वही तीसरा राहु जब उल्टी गति से दूसरे भाव मे आता है तो कुटुम्ब नाश के साथ धन नाश और बुद्धि नाश के लिये भी अपना प्रभाव देता है। अक्सर इस राशि वालो को जब राहु तीसरे से दूसरे भाव मे प्रवेश करता है तो जहर खाकर या किसी पारिवारिक क्लेश के कारण अपनी आत्महत्या तक करते हुये देखा गया है। 
  • कालसर्प दोष की मान्यता दक्षिण के मन्दिरों देखी जाती है,नासिक में भी कालसर्प दोष का निवारण किया जाता है.
  • रामेश्वरम मे नागनादिर मन्दिर और रामकुण्ड के पास मे बनी शेषनाग की वाटिका कालसर्प योग की निवृत्ति से ही जोडे गये है,जहां राहु को समुद्र और केतु को शिव लिंग के रूप मे मान्यता दी गयी है.
  • सुचिन्द्रम मे हनुमानजी के घुटने मे मक्खन लगा कर कालसर्प दोष की पूजा की जाती है.
  • इसी मन्दिर में नवग्रह की आराधना करने के लिये जो कालसर्प योग की सीमा मे आते है एक वस्त्र जो नीचे का होना जरूरी है और केवल पुरुष वर्ग के द्वारा ही पूजा की जाती है,ऊपर का वस्त्र धारण करने के बाद या तो पूजा लगती नही है या वह वस्त्र ही किसी न किसी कारण से कुछ समय मे बरबाद हो जाता है.
  • बंगाल मे भी दक्षिणेश्वर के पास मे बारह महादेव को शिव के रूप मे और माता काली को केतु के रूप मे प्रस्तुत किया गया है.
  • कालीघाट मे भी साततल्ला शमशान को राहु और कालीमाता को केतु के रूप मे प्रस्तुत किया गया है।
  • आसाम के कामाख्या मन्दिर मे भी शिवलिंग का अन्तर्भाग स्थापित करने के बाद उसके अन्दर माता कामाख्या को विराजमान किया गया है.जो भक्त गये होंगे उन्हे जो एक अहसास हुआ होगा वह राह और जो उन्हे द्रश्य हुआ होगा वह केतु के रूप मे माना जा सकता है.
  • अमरनाथ जाने पर भी बनने वाला शिवलिंग केतु और पहाडों की दुर्गम यात्रा को राहु के रूप मे माना जाता है.
  • हिमाचल की जितनी भी देवियां है वह केतु के रूप मे दुर्गा के रूप मे पूजी जाती है और उनके द्वारा दी जाने वाली शक्ति को राहु को रूप मे माना जाता है.
(कृपया अपने अधूरे ज्ञान से चलने वाली मान्यताओं के प्रति लोगों की धारणा को समाप्त नही करे,पहले ही धारणाओ और मर्यादाओं को समाप्त करने में अंग्रेजी शासन और पूर्व के शासको ने अपनी कमी नही छोडी है आज के मानव की जो हालत है वह किसी भी प्रकार से शांति दायक नही है जिसे देखो वह अपनी ही धुन मे बहा जा रहा है और धीरे धीरे अपनी सोच और अहम के कारण एक मानव के शरीर को धारण करने के बाद जानवरी प्रवृत्ति को अपनाने से बाज नही आ रहा है.)

1 comment:

चन्द्र प्रकाश दुबे said...

बहुत ही तार्किक एवं तथ्यपरक बातें कहा है आपने. दरअसल अधकचरा ज्ञान और आदेश में पनप रही अप संस्कृति ने देश के मूल ज्ञान से लोगों के बिच दुरी बना रखा है.