जीवात्मा योग

सूर्य और गुरु के मिलान में जातक को जीवात्मा योग का दर्जा दिया जाता है। गुरु जो जीव का कारक है और सूर्य आत्मा का कारक के मिलान को ही जीवात्मा योग का दर्जा दिया गया है। गुरु अपने मित्र ग्रही होकर अगर स्थापित है तो जीव का कारण मनुष्य शरीर में आकर दूसरों के लिये उपकार की भावना का उदय होना मिलता है,और वही गुरु अगर किसी प्रकार से राहु के साथ मिल जाता है तो वह जीवोद्धार के लिये आता तो है लेकिन वह कम से कम बहुत सारी समस्याओं से घिर भी जाता है,और उन समस्याओं के कारण ही उसका अन्त भी माना जाता है। राहु का प्रभाव गुरु से भी बहुत बडा माना जाता है। कारण गुरु का एक नियत स्थान है लेकिन राहु का स्थान असीमित है राहु की परिभाषा को कोई भी आज तक कह नही पाया है,वह किस तरह से अपना असर कहां से देगा इसका कोई विश्लेषण नही कर सका है। राहु की जरा सी गंदगी गुरु को आजीवन शुद्ध नही रहने देगी,और गुरु का पूरा का पूरा प्रभाव भी राहु की अशुद्धता को दूर नही कर सकता है। जीवात्मा योग के बारे में कहा गया है कि वह ईश्वर अंश से अवतारित है,और इसी के कारण वह सज्जनता की श्रेणी में गिना जाता है। गुरु के भावों में धनु और मीन राशि में यह युति धर्म और मोक्ष का रास्ता देती है,लेकिन मकर और वृश्चिक राशि में गुरु सूर्य की युति जातक के अन्दर ईश्वर अंश से अवतार होना तो मानते है लेकिन राज गद्दी के मोह के अन्दर वह सभी कुछ भूल जाता है और अपने खुद के ऐश्वर्य के लिये कार्य करने लगता है,जो दूसरों को देना था वह खुद ही खाने लगता है।

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