गुरु

देव दैत्य गुरु तदवत पीत श्वेतौ चतुर्भुजौ,दण्डिनो वरदौ कार्यो साक्षसूत्र कमण्डलु॥
गुरु को महर्षिं अंगिरा का पुत्र एवं देवताओं का गुरु माना जाता है,अन्य ग्रहों की भांति भारतीय पुराणों एवं अन्य ग्रंथों में गुरु की उत्पत्ति प्रभाव कार्यकलाप आदि के बारे मेम अनेक रोचक एवं प्रतीतात्मक आख्यान प्राप्त होते हैं।

एक आख्यान के अनुसर महर्षि अंगिरा की पत्नी अपने कर्म दोष के फ़लस्वरूप मृत्वत्सा हुयी,अर्थात नि:संतान रहीं,उनकी प्रार्थना पर ब्रह्मा ने उनसे पुत्र प्राप्ति के लिये पुंसवन व्रत करने के लिये कहा,इस व्रत की सम्पूर्ण जानकारी पति पत्नी को सनत कुमार से प्राप्त हुयी। मुनि पत्नी ने विधिपूर्वक व्रत किया,और विष्णु की कृपा से उन्हे एक ऐसा पुत्र प्राप्त हुआ जो तेजस्वी और प्रतिभा से संपन्न था। यही पुत्र बृहस्पति के नाम से त्रिलोक में विख्यात हुया।


स्कन्द पुराण के अनुसार गुरु ने अपने अभ्युदय के लिये प्रभात तीर्थ मे घोर तप किया। उनकी परम भक्ति से भगवान शंकर प्रसन्न हो गये,उन्होने गुरु को देव गुरु होने और गुरुत्व प्राप्त करने का वरदान दिया।

महाभारत की एक कथा के अनुसार देव गुरु बृहस्पति की दो पत्नियां थीं। एक का नाम शुभा और दूसरी का तारा था। शुभा से बृहस्पति को साथ पुत्रियां हुयीं,जिनके नाम थे - भानुमती,राका,अर्चिस्मती,महीमती,महिष्मती सिनोवाली और द्रविष्मती। तारा से उन्हे सात पुत्र और एक कन्या प्राप्त हुयी,जिसका नाम स्वाहा था। तारा पर चन्द्रमा की आशक्ति तथा उसके बलात अपहरण के बाद तारा और चन्द्रमा से बुध की प्राप्ति हुयी,चन्द्रमा से तारा को देवताओं ने अलग किया और तभी से चन्द्रमा पर दाग लगा माना जाता है।

भारद्वाज के भी बृहस्पति पुत्र होने की कथा मिलती है।

महाभारत में एक आख्यान मिलता है कि गुरु के दो भाई थे,बडे का नाम उत्तथ और छोटे का संवर्तक था। महाभारत में बृहस्पति की वर स्त्री नामक एक बहिन का भी उल्लेख मिलता है।

खगोलीय ज्ञान में गुरु

बृहस्पति ग्रह सूर्य से अडतीस करोड तेंतीस लाख मील दूर है। यह ग्रह सौरमंडल में सबसे विशाल ग्रह है। इसका व्यास अठासी हजार सात सौ मील है। यह आठ मील प्रति सेकेण्ड की गति से ग्यारह साल नौ माह में सूर्य की परिक्रमा कर लेता है।

ज्योतिष शास्त्र में गुरु
जीव की उपाधि ज्योतिष में गुरु से मानी जाती है। गुरु जो जीव का कारक है अपने स्थान के साथ तीसरे पांचवें सातवें और नवें भाव को देखता है। तीसरा स्थान उसके अपने प्रदर्शन से है वह किस भाषा और किस प्रकार के व्यक्तित्व को संसार में प्रदर्शन के लिये हाजिर करता है,इसके साथ ही उसकी जान पहिचान और उसकी क्रिया शैली किस प्रकार की है वह जब बाहर के संसार में अपने को ले जाता है तो उसे लोग किस रूप में पहिचानते है,यह सब गुरु की तीसरी नजर से माना जाता है। गुरु आध्यात्मिक और ईश्वरीय ज्ञान को प्रदान करने वाला माना जाता है,गुरु प्रधान व्यक्ति ईश्वरीय शक्ति को सामने रखने के बाद ही अपने विचार प्रकट करता है। जो भी सम्बन्ध गुरु प्रधान व्यक्ति से बनते है वे सभी धार्मिक होते है,उसके द्वारा बनाये गये सम्बन्ध कभी भी छिछोरे नही होते है कि आज सम्बन्ध अपने काम के प्रति बना लिये और काम निकलने के बाद सम्बन्धों को समाप्त कर लिया,यह भावना गुरु प्रधान जातक के अन्दर नही होती है वह सम्बन्ध बनाता है तो मानवीय सदगति के लिये बनाता है अन्यथा वह सम्बन्ध बनाता नही है। गुरु की वाणी भी पवित्र और साफ़ होती है उसे झूठ और झूठी बातों से तथा झूठे लोगों से नफ़रत होती है,जो व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिये गुरु के पास जाता है,गुरु उसके भाव को समझ कर अगर वह केवल अपने कार्य के लिये ही उसके पास आता है तो गुरु उसके काम को निकालने के बाद उसे भूल जाता है। गुरु का सम्बन्ध जन्म जन्मान्तर के लिये माना जाता है गुरु का सम्बन्ध एक दिन के लिये नही होता है। जिन जातकों का गुरु सही होता है उनके साथ माता पिता भाई बहिन पत्नी पति और जो भी रिस्तेदार होते है हमेशा के लिये जुडे होते है भले ही उनके अन्दर कोई गुरु प्रधान जातक की बुराई करे,लेकिन गुरु प्रधान जातक हमेशा अपने द्वारा जो भी करेगा वह अच्छा ही करता चला जायेगा। गुरु की तीसरी द्रिष्टि परिवार भाव में होती है वह अपने परिवार को भी धर्म और नियम से चलाने की आजीवन कोशिश करता है,उसके फ़ालतू समय के व्यतीत करने के साधनों में केवल पूजा पाठ और ध्यान समाधि ही माने जाते है। उसकी जो भी शिक्षा होती है वे समाज के हित के लिये ही होती है और वह जो भी शिक्षा प्राप्त करता है वह केवल अपनी मेहनत और अपने द्वारा समझे गये भाग को ही प्रदर्शित करता है वह किसी की टीप करने के बाद अपने विचारों को प्रदर्शित नही करता है। गुरु की भाषा संस्कृति से पूर्ण होती है,उसे लिखे गये शब्द का विश्लेषण करना आता है। वह अक्षर की कल्पना केवन उसके भाव को प्रदर्शित करने के लिये ही करता है,उसे जल्दी से धन कमाने की कोई इच्छा नही होती है वह केवल उतना ही धन प्रयोग करना चाहता है जिससे उसके जीवन में शरीर का पालन होता रहे,उसे धन को जमा करने की कोई जल्दी नही होती है और वह केवल उतना ही जमा रखता है जिससे सभी काम धर्म से पूर्ण हो जावें। गुरु की द्रिष्टि जातक के सप्तम स्थान में होने से वह अपने जीवन साथी को भी अपने जैसा चाहता है,अक्सर पति पत्नी के रिस्तों में तभी दरार आती है जब पति तो धार्मिक रूप से चलना चाहता है और पत्नी के अन्दर भौतिकता की अधिकता होती है,पत्नी और पति के अन्दर तकरार भी तभी होती है जब पत्नी पति को कहती है कि हमारे बच्चों के लिये कुछ भी नही है जबकि परिवार के अन्य लोग अपने अपने बच्चों के लिये क्या क्या कर रहे है। अथवा उसके लिये कोई सुख साधन नही है जबकि उसके परिवार वाले आराम से रह रहे है। गुरु प्रधान व्यक्ति का विश्वास ईश्वर में होने से वह हर बात को ईश्वराधीन मानता है उसके लिये अपने द्वारा कोई भी काम करना नही माना जाता है। जो भी उससे राय लेने के लिये आता है या अपनी व्यथा को सुनाता है गुरु प्रधान जातक का स्वभाव सीधा सा ईश्वर की तरफ़ इशारा करने से माना जाता है,और जो लोग बहुत ही अधिक दुखी होते है उन्हे अपनी राय से वह ईश्वर की तरफ़ जाने का मार्ग का रास्ता बता दिया जाता है। संसार में चलने वाली नीतियां और लोगों का अर्थ की तरफ़ अधिक झुकाव गुरु को परेशान करने वाला होता है,लेकिन वह कहता कुछ नही है जो व्यक्ति संसार में अधिक धन को कमाने के बाद भी सुखी नही रह पाते है वे बाद में गुरु की ही शरण में जाते है। गुरु की नवीं द्रिष्टि भाग्य और धर्म के घर पर होती है उसे लम्बी यात्रा करने और कानून से किये जाने वाले कामों के प्रति अच्छी जानकारी होती है,गुरु कभी भी अपनी योग्यता को कानून से परे नही जाने देता है। गुरु का मानसिक लगाव हमेशा धर्म की तरफ़ ही होता है विभिन्न देवी देवता की आराधना गुरु को करनी आती है वह अपने दिमाग और बुद्धि से सभी को उन देवी देवताओं की प्रकृति को बताने की कोशिश करता है। तथा जिस व्यक्ति के अन्दर जिस भी देवता की प्रकृति निवास करता है,उसी के बारे में बताकर और उसकी उपासना करने से उसकी गति को सुधारने की बात करता है। उसे भूत भविष्य और वर्तमान की जानकारी होती है वह अन्दाज लगाकर बता देता है कि अब कुछ घटना होने वाली है या अब समय के सुधार की बात होने वाली है। उसके द्वारा देवी देवताओं की पूजा पाठ करने के बाद एक प्रकार की दैवीय शक्तियां उसके अन्दर निवास करने लगती है इसलिये ही जो व्यक्ति उसके पास जाकर अभिवादन या चरण छूने से जो आशीर्वाद लेते है वे भी कष्टों से दूर होजाते हैं। गुरु की भावना कभी भी किसी के लिये बुरी नही होती है वह अपने प्रति बुरा चाहने वाले को भी आशीर्वाद ही देता है,उसे संसार के कार्यों और चलने वाले धर्म अधर्म के प्रति विवेचना करनी आती है। गुरु का ध्यान कभी भी एक स्थान पर नही रहता है वह हमेशा अपने पलायन को चाहता है और जहां भी जाता है वहां जाकर वह अपने धर्म और प्रकृति के प्रति लोगों को ज्ञान देने का काम करता है,उसे सात्विक भोजन के प्रति ही ध्यान रहता है। वह तामसिक भोजन के प्रति जीव हिंसा से बचने की कोशिश करता है,उसे वृक्षों से पके फ़ल प्राप्त करने और शाक पात को खाकर ही जीवन गुजारने की आदत होती है। वह उन्ही अनाजों को प्रयोग करता है जो सात्विकता के लिये माने जाते है जिन अनाजों से तामसिक विचार दिमाग में आते है उनसे बचने की कोशिश करता है।

2 comments:

आमीन said...

अच्छी जानकारी
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मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी जानकारी।